जिन्दगी को आज रुसवा होने का डर है...........
थमी हुई जिन्दगी में तूफान के मचल जाने का डर है.......
अभी तक तो जीने की बस कोशीस ही करते थे ....
अब हर कोशिश के नाकाम होने का डर है.......
काश कभी उनको ये चुभ न पाए.
जिनके लिय रातो में जग-जग के अपने को तरपाया............
उनके दिल को कभी इसकी आहट भी न हो पाया .........
आज जब उनको आरज़ू भी जुदा हो गई हमसे ...
खुदा करे उन्हें अब कभी शक्ल भी न दिखाये......
हम कांटे ठहरे उनके गुलशन के..
सो इस दुनिया से जुदा हो जाने का डर है .....
जैसे
"निर्मोही"


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