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कुछ तो मजबूरिय रही होगी वरना यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता.............?

Sunday, 28 August 2011

मेरी रूह भी महक रही है तुम्हारी मोहब्बत से .......

मेरे महबूब ......
मोहबत के शहर की 
जमी का वो टुकरा 
आज भी यादो की  खुसबू  से महक रहा है 
जहाँ 
मैंने सुर्ख गुलाबो की 
महकती पंखुरियो को 
तुम्हारे कदमो में बिछाया था....
तुमने कहा था -
यह फूल कदमो में बिछाने के लिय नहीं  है....
तुम्हारे बालो में सजाने के लिय है...
फिर तुमने 
खुले बालो में 
सुर्ख गुलाब लगते हुए कहा था -
आई लव यूं ...
तब से बल ही नहीं 
मेरी रूह भी महक रही है 
तुम्हारी मोहब्बत से .......


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